“माल ऐ मुफ्त दिल बेरहम” तेजा मेला ब्यावर

“माल ऐ मुफ्त दिल बेरहम” तेजा मेला ब्यावर

*माल ऐ मुफ्त दिल बेरहम*
पूरे वर्ष इंतजार करने के बाद तीन दिन के तेजा मेले में अपने परिवार का पेट पालने की जुगाड़ करते हुए जब इस उम्मीद में आते है कि बच्चो ओर परिवार को दो वक्त का खाना और पढ़ाई मुहैया करा सके, ओर वक्त पर बूढ़े माँ बाप की दवाई ओर चश्मा ला सके ।
लेकिन खाकी वर्दी का रोब, होमगार्ड, पार्षद ओर नेताओ द्वारा अपने परिवार और मिलने वालो को मुफ्त में झूला झुलाने के लिए झूले वालो से उलझते देखना पीड़ा दायक लगा ।
वो ऐसा क्यों करते है ?
क्या कुछ चंद रुपये बचाये जा सके इस लिए ?
उनको ऐसा करने के पहले यह सोचना चाहिए कि वो खानाबदोश दो वक्त की रोटी की जुगाड़ के लिए गांव गांव घुमता हैं, रात दिन मेहनत करता है तो तुम्हारा क्या अधिकार है जो उसकी मेहनत का पैसा ना देकर उस पर अपना रुतबा झाड़ने लगते हो ।
बेचारा धंधे का समय वैसे ही काम मिलता है इस लिए उनसे उलझ कर अपना समय खराब नही करना चाहता है इस लिए वो उनकी इन नाजायज हरकतों को सहन करता है
इस बिगड़े मौसम के कारण धंधे के समय बरसात के आने का डर हमेशा सताता रहता है कि यदि बरसात आ गई तो यह मेला बिखर जाएगा और वो कमाई नही कर सकेगा ।
क्या नगर परिषद झूले वालो से झूले लगाने के पैसे नही लेती है, लेती है और हर साल उसमे बढ़ोतरी भी करती है, बिजली वाला, टेंट वाला, सब उससे पैसा वसूलते है और वो भी मुंह मांगे, इसके वावजूद भी प्रशासन और नगर परिषद उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना तो दूर उल्टे मुफ्त में झूलने की चाह रखते है, ओर उस पर अपबे रुआब दिखाते है ।
यह कैसी मानवता है ।

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Hemendra Soni

M.D. & Chief Editor of BeawarDailyNews.com

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