राजस्थान: आतंक का सबसे खौफनाक चेहरा है ये गैंगस्टर, पुलिस की चूक से फरार

राजस्थान: आतंक का सबसे खौफनाक चेहरा है ये गैंगस्टर, पुलिस की चूक से फरार
नागौर। गैंगस्टर आनंदपाल सिंह, श्रीवल्लभ और सुभाष मुंड गुरुवार को अपने गुर्गों की मदद से राजस्थान के परबतसर में पुलिस वैन पर अंधाधुंध फायरिंग कर भाग निकले थे। फायरिंग में 8 पुलिसकर्मी घायल हुए।
आनंदपाल…अंतहीन आतंक की कहानी का सबसे खौफनाक चेहरा। किसी हिंदी फिल्मी की कहानी की तरह ही है, आनंदपाल। वो जहां भी रहा, हमेशा कायदे-कानून के आड़े आता रहा। 2001 में अपराध की दुनिया में आया। क्यों आया, इसकी हर कोई अलग दास्तां सुनाता है। कोई कहता है, राजनीति में ठोकर खाकर प्रभुत्व वाले लोगों का आतंक खत्म करने आया। कुछ बताते हैं, खुद का प्रभुत्व जमाने आया। अपने साथ अपने दो छोटे भाई- रूपेंद्र व मंजीत को भी लाया।
आगे-पीछे निजी एस्कॉर्ट हमेशा
कई अनकही-अनसुलझी कहानियों के बीच चंद सालों में दहशत का पर्याय बन गया-आनंदपाल और उसकी गैंग। हत्याएं, लूट, अपहरण और धमकाने के एक-एक कर 28 मामले तो केवल नामजद है। बाकी मामले कितने, किसी को नहीं पता। 300 से ज्यादा गुर्गों की ‘फौज’। आनंदपाल को लेकर सियासी हल्कों में भी चर्चा रही है।
आनंदपाल पुलिस के गिरफ्त में। फाइल फोटो।
भास्कर इन्वेस्टिगेशन: पुलिस ने ही दिया आनंदपाल को भागने का मौका
पूरे मामले में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। भास्कर ने मामले में पैरलल इन्वेस्टिगेशन की तो पता चला कि पुलिस आनंदपाल सिंह को भागने का मौका दे रही थी। गुरुवार जब आनंदपाल पेशी पर लाया गया तो कई बदलाव थे। सुरक्षा में केवल 15 पुलिसकर्मी ही तैनात थे। कमांडोज भी केवल 2 ही थे। जबकि हर बार 30 पुलिसकर्मियों के साथ 1 दर्जन कमांडोज होते थे। आनंदपाल पिछले दिनों किससे मिल रहा था, क्या कर रहा था। पुलिस ने पता लगाने का प्रयास नहीं किया। अपराधी जेल से मोबाइल और फेसबुक चला रहा था, लेकिन पुलिस ने परवाह नहीं की। छानबीन में सामने आई ये सारी बातें इस और इशारा कर रही है कि आनंदपाल भागा नहीं बल्कि उसे गहरी साजिश के तहत भगाया गया।
1. एस्कॉर्ट और मॉनिटरिंग फेल : अक्सर आनंदपाल या उसके गैंग के सदस्यों को पेशी पर लाने – ले जाने के दौरान पुलिस की गाड़ियां एस्कॉर्ट करती है। साथ ही संबंधित थानों की पुलिस भी आगे और पीछे के रास्ते की पहले से पुरी मॉनिटरिंग रखती है और नाकाबंदी रखती है। अगर गुरुवार को भी ऐसा होता तो रास्ते में आनंदपाल काे छुड़ाने के लिए गाड़ियों में भरकर आए बदमाश पहले ही कहीं न कहीं पकड़े ही जाते।
2. मुखबिर और सूचना तंत्र फेल : पुलिस का सूचना तंत्र भी घटनाक्रम में फेल ही रहा है। घटनाक्रम से पता चलता है कि आनंद पाल ने फरार होने की पूरी योजना बनाई थी। कहां, कब, कैसे और क्या करना था, सब कुछ प्री प्लान था, लेकिन पुलिस को उसकी योजना की भनक भी नहीं लगी। अगर लगी भी थी, तो पुलिस पूरी तरह अनजान बनकर बैठी रही।
3. खुंखार अपराधी पर इतना भरोसा कैसे : आनंदपाल जैसे खुंखार अपराधी पर पुलिस ने आंख मूंद कर भरोसा किया। उसके दिए गए चाय पानी को चालानी गार्ड खाते हैं और एक बार नहीं हर बार यही होता है। पुलिस को बंदी के रुपए से मंगवाया गया सामान खाने – पीने के लिए साथ नहीं भेजा जाता, बल्कि उसकी निगरानी के लिए भेजा जाता है।
4. जेल में डालकर भूल जाते हैं : आनंद पाल सिंह प्रदेश का सबसे कुख्यात अपराधी है। ये जेल से मोबाइल व अन्य माध्यम से अपने गिरोह संचालित कर रहा था। पता होने के बावजूद पुलिस कुछ नहीं कर रही थी। बीकानेर जेल में तो बंदूक भी पहुंच गई थी, ऐसे में इसके पास जेल में ही सारे संसाधन मौजूद थे। पुलिस की जेल में इसकी या इसके गैंग की निगरानी नहीं कर पाई।
5. फरारी के बाद भी ढिलाई : आनंदपाल के फरार होने के बाद पुलिस की सुस्ती नहीं उड़ी। उसके पास अत्याधुनिक हथियार थे, लेकिन पुलिस नाकाबंदी में बिना हथियार या ज्यादा से ज्यादा 3 नोट 3 राइफल के साथ ही खड़ी नजर आई। साथ ही केवल मुख्य रोड पर निगरानी की गई, छोटे रास्तों को छोड़ दिया। इतनी बड़ी वारदात के 1 घंटे बाद पुलिस के बडे़ अधिकारी सक्रिय हो सके।
वाहनों को चेक करती पुलिस।
वाहनों को चेक करती पुलिस।

 

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Hemendra Soni

M.D. & Chief Editor of BeawarDailyNews.com

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