हम कितने सभ्य हे •••विजेन्द्र प्रजापति

हम कितने सभ्य हे •••विजेन्द्र प्रजापति

•••••• हम कितने सभ्य हे •••••••••
शहर मे आये दिन हमे सुसभ्य बनाने के लिए बेनर पोस्टर लिए रैलियाँ निकलती है -आज स्कूली बच्चों द्वारा एक रैली निकाली गयी कल सफ़ाई कर्मचारीयो द्वारा रैली निकाली गयी
रैली के माध्यम से हमे आगाह किया जाता है कि किस प्रकार हम स्वयम् सफ़ाई का ध्यान दे अपने घर का कचरा कचरापात्र मे ही डाले -नालियों को साफ़ रखे -आज छोटे छोटे स्कूली बच्चे संदेश दे रहे थे “बिजली बचाओ सबको पढ़ाओ “बेटी बचाओ पानी बचाओ” इत्यादि कुछ दिन पहले नगर परिषद मे यातायात विभाग द्वारा हमे ट्रेनिंग दी गई -बाँये चलना चाहिये -हेलमेट का प्रयोग करना चाहिये -ज़ेब्रा लाईन यलो लाईन व रेड ग्रीन लाईट का पालन करना चाहिये -अख़बारों मे बढ़े बड़े विज्ञापन आते है कि बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई जाये –
प्रसव सुरक्षा -कर व नियम क़ानून के विज्ञापन आते है -टीवी पर अमिताभ बच्चन राष्ट्र धर्म निभाने की सीख देते हे -ओर तो ओर हमे हाथ धोने के फ़ायदे भी बताये जाते हाथ किस प्रकार से धोये जाये ताकि संकर्मण ना हो -टीवी पर रेल मे कैसे बैठे तथा सरकारी सम्पत्ति की कैसे सुरक्षा करे -यह तक सिखाया जाता हे –
ओर हम ऐसी रैलियों की पुष्प वर्षा कर स्वागत करते हे -बड़े नेताजी व नेताणी जी हरी झंडी दिखाकर फ़ोटो खिंचवा कर ख़ुश होते हे ।
क्या किसी बुद्धिजिवि ने इस पर चिन्तन मनन किया है -ऐसी रैलियों व स्लोगन व सिख देने वालों पोस्टरों पर दुख प्रकट किया है -यह भारत है सीख देने वाली बाते स्लोगन आते हे दिवारो पर लिखना व चिपकाना मना हे यह बात दिगर हे कि यहीं लोग दिवारो पर “भारत निर्माण” “मेक इन इंडिया” लिख कर ख़ुद को मूर्ख घोषित करते है –
एक सबसे बडा प्रश्न यह हे कि ऐसी रैलियों व स्लोगन पोस्टरों से यह सिद्ध नही होता कि भारतीय आज भी आदिवासी युग मे जी रहा हे या भारतीय नागरिक सिस्टम को फोलो नही कर रहा है या भारतीय नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति कितनी लापरवाह हे-जब भी सीख देने वाली रैलियाँ निकलती हे तो मेरे जैसे व्यक्ति को बहुत दुख होता हे कि हमारेी असामाजिकता व बेहुदेपन का खुले आम यह रैलियाँ चित्रण कर रही हे -हम अभी तक भी गँवार आदिवासी है हम अभी तक भी ढंग से सड़क पर चलना नही जानते हम अभी तक हाथ धोना नही जानते हमने आज तक पानी की किमत नही जानी !पर्यावरण बचाने के लिए लकड़ी को नही पहचाना ! नगर को साफ़ रखने मे हम कितने लेजी हे ।।
हम बिजली बचाने के तरिके नही जानते !!
हमे बच्चों की शिक्षा संस्कार लालन पालन का तरिका नही आता ।।
वास्तव मे इन सभी बातों पर विचार करे ओर प्रत्येक नागरिक सच्चाई से स्वविवेक से अपने आप से पूछे कि क्या यह वास्तविकता हे कि मै इन सभी तथ्यों के प्रति लापरवाह हूँ ।।
सच मे हम सब शर्म से लाल हो जायेंगे कि हम कितने फूहड़ असभ्य ज़ाहिल गँवार समाज के नागरिक है
क्या हमे शर्म नही आती जब छोटे छोटे बच्चे हाथ मे तख़्तियाँ लेकर हमे समझाते है कि किस प्रकार बिजली बचाना है ।।।। हम अपने आप को तब क्यो ना गाली दे जब सुबह अख़बार मे यह विज्ञापन पढ़ते हे कि पर्यावरण की रक्षा के लिए एक पेड़ लगाना ज़रूरी है ।।।हम अपने आप को क्यो नही अपमानित करते हे जब सरकार के नुमाइन्दों द्वारा यह संदेश दिया जाता कि सरकारी सम्पत्ति की रक्षा राष्ट्र धर्म है ।।।।हम अपने आप को क्यो नही थप्पड़ रसीद करते जब हमे यह समझाया जाता है कि स्वच्छता मे आप भागीदार बने—।।।
यक्ष उत्तर —हमे नागरिक धर्म से विमुख है —हम सभ्य समाज की स्थापना मे हमारा कोई सरोकार नही सच्ची बात हमे सुसभ्य तरिके से जीना रहना खाना पीना नही आता ।।
कटु बात हम असभ्य हे ।।।
लाख टके की बात हम समाज सरकार देश के सिस्टम को फोलो नही करते है —-।।।।
सुधरने व सुधारने की शुरूआत स्वयम् से करे अपने आप समाज शहर राज्य देश सुधर जायेगा ।।
(इस लेख को अन्यथा ना ले यह भारत के प्रत्येक नागरिक की कर्तव्यविमूढता की सच्ची तस्वीर है )
विजेन्द्र प्रजापति
( स्वतंत्र लेखक )

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Hemendra Soni

M.D. & Chief Editor of BeawarDailyNews.com

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