भरतपुर और धौलपुर के जाटाें का आरक्षण खत्म, 16 साल बाद आया फैसला

भरतपुर और धौलपुर के जाटाें का आरक्षण खत्म, 16 साल बाद आया फैसला
जयपुर. आखिरकार 16 साल सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने जाट आरक्षण मामले में सोमवार को फैसला सुना दिया। कोर्ट ने भरतपुर और धौलपुर के जाटों को ओबीसी वर्ग में मिल रहे आरक्षण को गलत ठहराते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह दोनों जिलों के जाटों को ओबीसी वर्ग से बाहर करे। कोर्ट ने दोनों जिलों के जाटों को ओबीसी में आरक्षण देने के संबंध में 10 जनवरी, 2000 को जारी की गई अधिसूचना को भी रद्द कर दिया। जाटों को आरक्षण के विरोध में 1999 में याचिका लगाई गई थी। 16 साल सुनवाई के बाद हाल ही 9 जुलाई को हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।
असर क्या?
भरतपुर और धौलपुर में जाट समाज के जो लोग आरक्षण का लाभ ले चुके हैं, उन पर नोटिफिकेशन रद्द करने का असर नहीं होगा। बाकी जिलों में जाट समाज को आरक्षण बरकरार रहेगा।
आगे क्या?
याचिकाकर्ता रामकिशोर गुर्जर हाईकोर्ट के फैसले को एसएलपी के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। उनका कहना है सिर्फ दो जिले नहीं समूचे प्रदेश में जाट समाज को आरक्षण खत्म होना चाहिए।
4 माह में सरकार स्थाई ओबीसी कमीशन बनाए
मुख्य न्यायाधीश सुनील अंबवानी व न्यायाधीश अजीत सिंह की खंडपीठ ने सरकार को आदेश दिया है कि वह चार माह में कानून बनाकर ओबीसी वर्ग की सूची के आकलन के लिए स्थाई ओबीसी कमीशन गठित करे। इस मामले में राज्य सरकार इंदिरा साहनी मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन भी करे।
केन्द्र व राज्य सरकार ओबीसी वर्ग की केन्द्रीय लिस्ट व राज्य की लिस्ट का रिव्यू कराएं। रिव्यू करते समय ओबीसी वर्ग की सभी जातियों, समूह, समुदाय और भरतपुर व धौलपुर के जाटाें को भी शामिल किया जाए।
16 साल चली अदालत में दलीलें, बहस
याचिकाकर्ता
अधिवक्ता एसएन कुमावत ने कोर्ट में बताया था- ओबीसी में शामिल जातियों की नियमित समीक्षा का प्रावधान है। सिर्फ जाति चयन का आधार नहीं रह सकती क्योंकि जाति की स्थिति क्षेत्र के आधार पर बदल जाती है। ओबीसी में जाटों का आरक्षण रद्द किया जाए।
सरकार
महाधिवक्ता धर्मवीर ठोलिया ने दलील दी थी कि जाटों को आरक्षण का लाभ सार्वजनिक सुनवाई और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसा पर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी भरतपुर व धौलपुर के जाटों को छोड़कर केन्द्र में जाटों के आरक्षण को सही माना है।
फैसला त्रुटिपूर्ण
फैसला त्रुटिपूर्ण है। शैक्षणिक, सामाजिक हालातों के पर ओबीसी में जाति का चयन होता है। -एसएन सिंह, पूर्व सदस्य सचिव-ओबीसी आयोग
अब बराबरी का फैसला
अब ओबीसी आयोग के सामने रिव्यू में दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। जाटों के पक्ष में कई रिपोर्ट हैं। -राजाराम मील, अध्यक्ष, जाट महासभा

 

 

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Hemendra Soni

M.D. & Chief Editor of BeawarDailyNews.com

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