भाजपा में एक व्यक्ति एक पद नियम सख्ती से लागू हो -सिद्धार्थ जैन पत्रकार

भाजपा में एक व्यक्ति एक पद नियम सख्ती से लागू हो -सिद्धार्थ जैन पत्रकार

भाजपा में एक व्यक्ति एक पद नियम सख्ती से लागू हो
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राज्य भाजपा संगठनात्तमक चुनावों को लेकर जबरदस्त हलचल मची हुई हे।वार्ड, मंडल, शहर से लेकर जिला और प्रदेश स्तर पर अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई हे। क्या होगा क्या नही होगा.. की असमंजसता अभी से बरकरार हे। आम कार्यकर्ताओं के मन में चुनावों को लेकर संशय बना हुआ हे। चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल भी खड़े किये जाने लगे हे।

कई बरसों पहले पूर्व में अनुशासित पार्टी मानी जानी जाने वाली भाजपा अब अराजकता से ओत प्रोत होती हुई नजर आने लगी हे। “काडर बेश” पार्टी अब “काडर लेश” की दिशा मे तेजी से अग्रसर होती दिख रही हे। मतलब परस्त, धन बटोरू, महत्वाकांक्षी, पद लौलूप जैसे गैर भाजपाई-संघी लोगो की गिरफ्त में पार्टी झकड़ी हुई लगती हे..! यही कारण हे कि चुनावो में धन का जोर दिखेगा। भाई भतीजा वाद और रिश्तो की जोर आजमाइश चलेगी। पार्टी आकाओं व विधायको की कौन कितनी चम्पी व बटरिंग करता हे..! उसी बिना पर ही उसे अध्यक्ष व अन्य पदों की “रेवड़ी” से नवाजा जा सकेगा..!

पार्टी को माँ समान मान कर संगठन को मजबूत करने वालो के दिन अब लद गये। यह सब बीते जमाने का ईतिहास हो गया। ऐसी कोई बात करने वाले को हिकारत की नजरो से देखा जाता हे। यह भी तय हे कि वह तो पार्टी का अध्यक्ष सपने में भी नही बन सकता..! हा! जो स्थानीय विधायक का गुण गान करेगा। जरूरत के खर्चे करने को तत्पर रहेगा। आदि.. आदि। उसके लिए तो फिर भी सम्भावनाए जिन्दा रहेगी। वह अध्यक्ष नही तो संगठन में ही कोई ना कोई पद हासिल कर ही लेगा। उसी बूते सत्ता पक्ष के चलते उसकी “दुकान” चलती रहेगी।

आपको याद दिला दू। एक दफा भेरोसिंह शेखावत के मुख्यमन्त्री कार्यकाल में पार्टी स्तर पर कुछ कार्यकर्ताओं को प. बंगाल भेजा गया था। यह सीखने के लिए कि वहा की कम्युनिष्ट सरकार लगातार कई बरसों तक सत्ता में कैसे बनी हुई हे..! पता चला कि संगठन ही उसकी प्राण वायु हे। भाजपा को तो ठेट वहा तक भी जाने की जरूरत नही होनी चाहिए। अपने मातृ संगठन से ही सीख ले ले। जिस संगठन आरएसएस को दुनिया मानती हे। उसी की बैशाखी पर सवार हो सत्ता हासिल करने वाला दल उसे ही विस्मृत करने की हिमाकत करने का दु:साहस कर बेठता हे।

कम्युनिष्ट पार्टी जैसे ही भाजपा को भी संगठन और सत्ता को अलग अलग रखने की जरूरत हे। संगठन का सत्ता में दखल पूरा हो लेकिन सत्ता का संगठन में कोई दखल नही होना चाहिए। हालाकि यह थ्योरी बहुत ही दूर की कौड़ी लगती हे। लेकिन इसके बिना पार्टी की कोई गत नही होगी। यह भी आवश्यक हे कि सत्ता व संगठन में भरपूर ताल मेल बना रहे। यह तब ही सम्भव हे जब कि किसी का कही कोई दखल नही हो। अन्तिम निर्णय तो संगठन का ही सर्वमान्य होना चाहिए।

भाजपा को एक व्यक्ति एक पद वाली गाईड लाइन भी बनानी पड़ेगी। इस पर सख्ती से अमल करने की भी दरकार हे। इसकी पालना गाँव से लेकर ठेट दिल्ली तक कड़ाई से करनी होगी। इसे इस प्रकार परिभासित किया जाना चाहिए: ग्रामीण स्तर से जिला व राज्य स्तर पर जो भी पंच सरपंच पं.स. सदस्य जि.प. सदस्य प्रधान जिला प्रमुख व विधायक हे उनको किसी भी दुसरे पद से कतई नही नवाजा जावे। यही नियम सांसद मंत्रियों के लिए भी लागू होना चाहिए। ऐसे लोगो को संगठन में ही नही अपितु सरकार में भी किसी भी लाभ के पद पर नही रखा जाना चाहिए। इससे किसी न किसी कार्यकर्ता को ही लाभ मिलेगा।

सत्ता में कुंडली मारे नेताओं को यह सब अच्छा नही लगेगा। गले नही उतरेगा। लेकिन सत्ता में लगातार बने रहने के लिए संगठन को तो चुस्त दुरस्त करने की महत्ती आवश्यकता होगी। भाजपा नेताओं से ऐसी कोई आशा करना ही बेकार होगी। इसके लिए मातृ संगठन आरएसएस को ही कड़े कदम उठाने पड़ेंगे। संघ स्वयंसेवक प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी से देश को बहुत आशा हे। उनको पूरा समय मिलना चाहिए। सरकार में मोदी को खुल्ला फ्री हेंड मिलता रहना चाहिए। वही संघ का धर्म हे कि वह संगठन को बुलन्दी पर ले जाने के लिए जो कुछ भी कर सके करे। संघ ग्रामीण स्तर तक हे। वह अपने नेट वर्क से एक व्यक्ति एक पद पर कड़ाई से नजर रखावे। संगठन की मजबूती के लिए सभी प्रकार के दबावों से दुरी बनाये रखे। चाहे प्रदेश अध्यक्ष हो अथवा मंडल अध्यक्ष। सभी केवल और केवल संगठन के लिए ही समर्पित हो। आरएसएस ही तो भाजपा का असली पाँवरहाउस हे। यही सब सोचकर ही आरएसएस को संगठन के लिए सख्त रहने की जरूरत हे।
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सिद्धार्थ जैन पत्रकार, ब्यावर(राज.)
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Hemendra Soni

M.D. & Chief Editor of BeawarDailyNews.com

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