भाजपा मण्डल ब्यावर

भाजपा मण्डल ब्यावर

रामप्रसाद कुमावत ( निरंतर )

भाजपा मण्डल ब्यावर के अध्यक्ष के चुनाव काे लेकर जिस तरह की चिन्ता और चिंतन जताया जा रहा है उसकी न तो जरूरत है और न ही यह व्यावहारिक है। लाेकतान्तरिक व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यही है कि इसमें सत्ता पर काबिज होने के बाद तन्त्र सदा ही अगले चुनाव तक लाेक काे भूल जाता है। इसीलिये तो सत्ता और संगठन में दूरियां बढ़ने लगती है। अगर सत्ता की सीधी पहुंच जनता तक है ताे संगठन काे भी ठेंगा दिखाने में हिचक नहीं की गई। यह सच पी एम भी जानते हैं और संघ प्रमुख भी। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब नागपुर पीठ के फरमानाें की अनदेखी की गई। संघ का तुष्टिकरण करने के लिए विधायक अक्सर पथ संचलन में नेकर टोपी में हाजिरी लगा देते हैं। बाद में वही ढर्रा। संघ का आदेश सिर माथे पर नाला तो वहीं गिरेगा। राजनीति की व्यावहारिकता काे सरल तरीके से समझाता हूँ। आम शिकायत जब यह है कि सत्ता और संगठन में तालमेल नहीं है ताे इसका सीधा इलाज यही है कि आप संगठन काे सत्ता की मर्जी के मुताबिक रूप दे दाे। इसका निर्णय भी ताे सत्ता ही करती है। अशोक परनामी वसुंधरा की निजी पसंद नहीं हाेते ताे पार्टी कार्यालय में अगरबत्ती किसी और के नाम की जल रही हाेती। सत्ता की विवशता सिर्फ इतनी भर है कि उसे हर हाल में दुबारा लाैटने की आकांक्षा रहती है। ऐसी मजबूरी नहीं होती ताे देश में आरक्षण सहित कई मसलों को न्यायोचित ठहराने के सुर और तर्क सभी बदल जाते। संगठन के चुनाव लाेकतान्तरिक तरीके से करने का दिखावा सब जगह है। इसीलिये गुटबाजी पनपती है, कार्यकर्ता काे दबाया जाता है। एक सच और है।संगठन चलाने के लिए खर्च भी उठाना पड़ता है और वह सत्ता के संरक्षण बिना संभव नहीं। आप किस बूते पर धमकी देकर चन्दा लाओगे?  भूखे भण्डारी की बात काैन सुनेगा? राजनीति में कई बाराती ताे जीमने के लिए ही साथ रहते हैं। यह जीमन भी जरूरी है। नहीं करा सकते तो आपकी पकड़ ढीली मानी जायेगी। और भी कई बातें हैं जो बाद में बताऊंगा। फिलहाल इतना ही कि आर एस एस के लिए खुलकर सब कहते हैं कि यह गैर राजनीतिक संगठन है ताे फिर इसकी सत्ता में सीधी दखल और सरकार काे अपने तरीके से, अपने एजेन्डे से संचालित करने की महत्वाकांक्षा किसलिए ? इस मामले में भी संघ की तरफ देखकर यह उम्मीद करना कि वह काेई समाधान निकाल देगा, अंधेरे में काली बिल्ली ढूंढने जैसा ही है, वाे भी उस बिल्ली काे जाे वहां है ही नहीं। जाे संघ खुद अपनी गैर राजनीतिक छवि में राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सत्ता काे अपनी गाेटी जैसे चलाने की इच्छा से उन पर पूरा नियंत्रण रखने का मंसूबा पूरा होते नहीं देख पाता उससे संगठन चुनाव में दखल की उम्मीद भी बेमानी है। आज अगर अमित शाह के केन्द्रीय अध्यक्ष हाेने पर यदि संघ इतराता है ताे यह नहीं भूलना चाहिये कि वे माेदीजी की पहली और अंतिम पसन्द के कारण इस पद पर हैं। संगठन यदि सत्ता की पसन्द का नहीं है ताे पार्टी काे ही खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

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Hemendra Soni

M.D. & Chief Editor of BeawarDailyNews.com

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